छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले से एक बेहद शर्मनाक और दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जिसने समाज को झकझोर कर रख दिया है। हवस में अंधे दरिंदों की हैवानियत अब इस कदर बढ़ चुकी है कि मासूम बच्चों तक को नहीं बख्शा जा रहा। यह घटना सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि समाज की गिरती मानसिकता का भयावह चेहरा है।
दुर्ग जिले का एक छोटा इलाका…जहां लोग एक-दूसरे को नाम से जानते थे, बच्चे गलियों में बेफिक्र खेलते थे, और हर घर में अपनापन था। लेकिन एक दिन इसी मासूमियत पर किसी की काली नजर पड़ गई…दोपहर का वक्त था। स्कूल से लौटकर 5 साल की मासूम बच्ची रोज की तरह घर के पास दुकान पर चॉकलेट लेने गई। उसे क्या पता था कि वहां खड़ा एक शख्स उसकी जिंदगी का सबसे डरावना चेहरा बनने वाला है।
वो शख्स था..35 वर्षीय धनेश्वर साहू… जो पहले से बच्ची को जानता था। उसने मुस्कुराकर कहा, “चलो, मैं तुम्हें और अच्छी चॉकलेट दिलाता हूं…”मासूम ने भरोसा किया… और यही भरोसा उसके लिए खतरा बन गया।
धनेश्वर उसे अपने घर ले गया। घर के भीतर जो हुआ, उसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। हवस में अंधे इस दरिंदे ने बच्ची के साथ वो घिनौना अपराध किया, जिसे शब्दों में बयां करना भी मुश्किल है।
लेकिन उसकी हैवानियत यहीं नहीं रुकी…अपने जुर्म को छिपाने के लिए उसने बच्ची का मुंह तकिए के कवर से कसकर बांध दिया, ताकि उसकी आवाज बाहर न जाए। फिर उसे एक बोरे में भरकर घर के पीछे सुनसान जगह-खंडहर और कुएं के पास फेंक दिया…उसकी नीयत साफ थी-मासूम की सांसें हमेशा के लिए थम जाएं।
उधर, बच्ची के घर में बेचैनी बढ़ रही थी मां की आंखें दरवाजे पर टिकी थीं, पिता हर गली में उसे ढूंढ रहे थे… धीरे-धीरे पूरा गांव खोज में जुट गया। करीब दोपहर 2 बजे… दो युवकों की नजर एक बोरे पर पड़ी-जो हल्का-सा हिल रहा था। शक हुआ… पास गए… और जब बोरा खोला-तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।
अंदर वही मासूम बच्ची थी… जिंदा… लेकिन डरी हुई, सांस लेने के लिए जूझती हुई।
बच्ची को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। डॉक्टरों की टीम ने इलाज शुरू किया… और कुछ घंटों की जद्दोजहद के बाद राहत की खबर आई- मासूम अब खतरे से बाहर है।
पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी धनेश्वर साहू को गिरफ्तार कर POCSO एक्ट के तहत कड़ी धाराएं लगा न्यायिक हिरासत में सलाखों के पीछे भेज दिया ।
जैसे ही गांव में यह खबर फैली, लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। हर कोई एक ही बात कह रहा “ऐसे दरिंदे को जीने का हक नहीं!”
लेकिन सवाल अब भी वही है-
क्या सिर्फ सजा से ऐसे अपराध रुक जाएंगे?
या हमें अपने आसपास के चेहरों को पहचानना होगा…अपने बच्चों को सतर्क करना होगा…और समाज को मिलकर इन दरिंदों के खिलाफ खड़ा होना होगा?
यह कहानी सिर्फ एक घटना नहीं, एक चेतावनी है-
कि खतरा हमेशा बाहर नहीं, कभी-कभी हमारे आसपास ही छिपा होता है।
मासूमियत की रक्षा अब सिर्फ परिवार नहीं, पूरे समाज की जिम्मेदारी है।


