“वाह रे सिस्टम! गरीब का घर कागजों में बन गया, लेकिन गोविंद आज भी छत का इंतजार कर रहे हैं”
प्रधानमंत्री आवास की ‘चोरी’ का आरोप, हितग्राही बोला- न पैसा मिला, न मकान मिला, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में बन भी गया और भुगतान भी हो गया
CHHATTISGARH/ बलौदा बाजार। कहते हैं चोर घर से सामान चुराकर ले जाते हैं, लेकिन बलौदा बाजार जिले में तो कथित तौर पर किसी ने गरीब का पूरा का पूरा घर ही ‘चुरा’ लिया। हैरानी की बात यह है कि न तो दीवारें उठीं, न छत डली और न ही हितग्राही को एक रुपये की राशि मिली, लेकिन सरकारी कागजों में मकान बन भी गया और उसका पूरा भुगतान भी हो गया।
यह मामला बलौदा बाजार जिले के पलारी विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत दतान (प) के आश्रित ग्राम नगपुरा का है, जहां निवासी गोविंद रात्रे ने अपने नाम से स्वीकृत प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के कथित गबन और हेराफेरी की शिकायत थाना पलारी में दर्ज कराई है। उन्होंने आरोप लगाया है कि उनके नाम से स्वीकृत प्रधानमंत्री आवास किसी और के नाम पर दर्शाकर उसकी पूरी राशि का भुगतान कर दिया गया है।
2018 में हुआ था सर्वे, 8 साल तक करते रहे इंतजार
गोविंद रात्रे ने बताया कि वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के सर्वे के दौरान उन्होंने अपने मिट्टी के घर के सामने फोटो खिंचवाकर सर्वे में हिस्सा लिया था। इसके बाद उनके नाम पर आवास स्वीकृत हुआ और मकान निर्माण के लिए स्थल का चयन भी किया गया। उन्हें उम्मीद थी कि जल्द ही उनके खाते में पहली किस्त की राशि आएगी और वे अपने सपनों का पक्का घर बना सकेंगे।
लेकिन एक साल, दो साल नहीं बल्कि पूरे आठ साल बीत गए। वर्ष 2026 तक उनके खाते में योजना की कोई राशि नहीं पहुंची। शुरुआत में उन्होंने इसे सरकारी प्रक्रिया में देरी समझकर इंतजार किया, लेकिन जब इंतजार लंबा होता गया तो उन्होंने खुद इसकी जानकारी लेने का फैसला किया।
जनपद पंचायत पहुंचे तो उड़ गए होश
जब गोविंद रात्रे जनपद पंचायत पलारी पहुंचे और अपने आवास की जानकारी मांगी तो जो जवाब मिला, उसे सुनकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। अधिकारियों ने उन्हें बताया कि उनका प्रधानमंत्री आवास बनकर तैयार हो चुका है और उसका पूरा भुगतान भी कर दिया गया है।
यह सुनकर गोविंद रात्रे सकते में आ गए। जिस मकान का वे वर्षों से इंतजार कर रहे थे, वह सरकारी रिकॉर्ड में कब बना और किसके लिए बना, इसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। इसके बाद उन्होंने मामले की पड़ताल की तो कथित तौर पर पता चला कि उनके नाम से स्वीकृत आवास का लाभ किसी अन्य व्यक्ति को पहुंचा दिया गया।
सभी प्रक्रियाएं पूरी की थीं
शिकायत के अनुसार, प्रधानमंत्री आवास योजना (मोर आवास) के तहत हितग्राही आईडी 127140256-0 उनके नाम से स्वीकृत हुई थी। गोविंद का कहना है कि उन्होंने शासन द्वारा निर्धारित सभी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी की थीं। जियो टैगिंग, फोटो अपलोड सहित अन्य औपचारिकताओं का भी पालन किया गया था।
इसके बावजूद आज स्थिति यह है कि सरकारी रिकॉर्ड में उनका मकान पूर्ण हो चुका है, जबकि वास्तविकता में वे आज भी अपने पुराने घर में रहने को मजबूर हैं।
‘घर नहीं, भरोसा चोरी हुआ है’
यह मामला केवल एक प्रधानमंत्री आवास का नहीं बल्कि सरकारी योजनाओं पर गरीबों के भरोसे का भी है। सवाल यह उठता है कि यदि हितग्राही को राशि नहीं मिली तो भुगतान किसके खाते में हुआ? अगर मकान बना है तो कहां बना? और यदि किसी अन्य व्यक्ति को लाभ दिया गया तो जिम्मेदार कौन है?
कागजों में घर बन जाना और जमीन पर उसका अस्तित्व न होना, व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करता है। गरीब को घर देने वाली योजना में यदि उसका घर ही कथित रूप से गायब हो जाए तो इसे महज तकनीकी त्रुटि नहीं कहा जा सकता।
जांच के लिए बनी दो सदस्यीय टीम
इधर शिकायत सामने आने के बाद पलारी के एसडीएम दीपक निकुंज ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच के लिए दो सदस्यीय टीम का गठन किया है। उन्होंने बताया कि इस प्रकार की गड़बड़ी पहले भी सामने आ चुकी है, जिसमें वास्तविक हितग्राही को योजना की राशि उपलब्ध कराई गई थी।
एसडीएम ने कहा कि वर्तमान मामले की भी निष्पक्ष जांच की जाएगी और यदि शिकायत सही पाई जाती है तो वास्तविक हितग्राही को उसके प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ दिलाया जाएगा।
अब सभी की निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। क्योंकि सवाल केवल एक मकान का नहीं, बल्कि उस गरीब की उम्मीदों का है, जो आठ साल से अपने सपनों की छत का इंतजार कर रहा है।

