धर्मेन्द्र सिंह सुकमा
सुकमा के ग्रामीणों की अनोखी गुहार ने सिस्टम पर खड़े किए बड़े सवाल, केंद्रीय गृहमंत्री को लिखा पत्र
Amit Shah को लिखा गया एक अनोखा आवेदन इन दिनों पूरे छत्तीसगढ़ में चर्चा का विषय बना हुआ है। मामला धुर नक्सल प्रभावित रहे Sukma जिले के मरुकी (मारोकी) गांव का है, जहां वर्षों से सड़क की बदहाली से परेशान ग्रामीणों ने अब सरकार से सड़क नहीं, बल्कि सीधे हेलीकॉप्टर की मांग कर दी है। सुनने में यह मांग भले ही अजीब लगे, लेकिन इसके पीछे छिपी ग्रामीणों की पीड़ा और प्रशासनिक लापरवाही की कहानी बेहद गंभीर है।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे आवेदन में ग्रामीणों ने साफ शब्दों में लिखा है कि यदि सरकार उनके गांव तक एक पक्की सड़क नहीं पहुंचा सकती, तो कम से कम उन्हें आने-जाने और मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के लिए हेलीकॉप्टर उपलब्ध करा दिया जाए। ग्रामीणों की यह मांग अब सिर्फ एक व्यंग्यात्मक विरोध नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रदेश के दूरस्थ इलाकों में विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को उजागर कर रही है।
10 साल से अधूरी सड़क, गड्ढों में फंसी जिंदगी
ग्रामीणों का आरोप है कि गांव तक पहुंचने वाली सड़क का निर्माण पिछले करीब 10 वर्षों से अधूरा पड़ा हुआ है। सड़क निर्माण के नाम पर जगह-जगह पुल-पुलिया के लिए बड़े-बड़े गड्ढे खोद दिए गए, लेकिन काम बीच में ही छोड़ दिया गया। हालत यह है कि पूरी सड़क पर केवल गिट्टियां बिखरी हुई हैं और बरसात के दिनों में रास्ता दलदल में तब्दील हो जाता है।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क पर चलना तो दूर, कई बार बाइक और ट्रैक्टर तक फंस जाते हैं। गांव तक पहुंचने के लिए लोगों को जान जोखिम में डालनी पड़ती है। बरसात के मौसम में हालात इतने खराब हो जाते हैं कि गांव लगभग मुख्यधारा से कट जाता है।
मरीजों को खाट पर ढोने की मजबूरी
मरुकी गांव के आगे पहाड़ी इलाका शुरू हो जाता है, जिससे समस्या और भी गंभीर हो जाती है। ग्रामीणों ने बताया कि गांव में यदि कोई गर्भवती महिला, बुजुर्ग या बीमार व्यक्ति अचानक गंभीर हो जाए, तो उन्हें खाट या चारपाई पर लादकर कई किलोमीटर दूर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है।
ग्रामीणों ने दर्द बयां करते हुए कहा कि कई बार घंटों पैदल चलने के बाद सड़क तक पहुंचते हैं, जहां किस्मत अच्छी रही तो एम्बुलेंस मिल जाती है, अन्यथा मरीज को खाट के सहारे ही गादीरास अस्पताल तक पहुंचाना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार समय पर इलाज नहीं मिलने से मरीजों की हालत और बिगड़ जाती है।
“मुफ्त राशन भी महंगा पड़ रहा”
ग्रामीणों ने अपनी एक और बड़ी समस्या बताते हुए कहा कि राशन लेने के लिए उन्हें करीब 11 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। जिनके पास पैसे होते हैं, वे ट्रैक्टर में बैठकर जाते हैं, लेकिन उसके लिए भी 100 रुपये किराया देना पड़ता है। जिनके पास पैसे नहीं होते, उन्हें पैदल ही पूरा रास्ता तय करना पड़ता है।
ग्रामीण सुका ने कहा कि सरकार मुफ्त में राशन तो देती है, लेकिन उसे लेने के लिए हमें अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ते हैं। अगर सड़क ठीक होती तो यह परेशानी नहीं होती। गांव वालों का कहना है कि शासन की योजनाओं का लाभ भी उनके लिए संघर्ष बन चुका है।
अधिकारियों के चक्कर काटते-काटते थक गए ग्रामीण
गांव के सरपंच सविन मरकाम ने प्रशासन के रवैये पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि पिछले 10 वर्षों में उन्होंने छोटे अधिकारियों से लेकर कलेक्टर तक हर स्तर पर आवेदन दिया, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला। सरपंच का कहना है कि अधिकारियों ने गांव की समस्या को गंभीरता से कभी नहीं लिया।
ग्रामीणों का कहना है कि वे धरना-प्रदर्शन या चक्काजाम भी कर चुके हैं, लेकिन हालात नहीं बदले। आखिरकार उन्होंने अपनी पीड़ा सीधे देश के गृहमंत्री तक पहुंचाने का फैसला लिया।
“पहले नक्सलवाद बहाना था, अब क्या वजह है?”
ग्रामीणों ने अपने आवेदन में यह भी लिखा है कि पहले इलाके में नक्सली गतिविधियों का हवाला देकर सड़क निर्माण टाल दिया जाता था। लेकिन अब सरकार खुद दावा कर रही है कि क्षेत्र में नक्सलवाद काफी हद तक खत्म हो चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर अब तक गांव की सड़क क्यों नहीं बन पाई?
ग्रामीणों का कहना है कि जब पूरा प्रदेश विकास के दावे कर रहा है, तब उनका गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। गांव वालों का कहना है कि यदि सरकार सड़क नहीं बना सकती, तो कम से कम हेलीकॉप्टर ही दे दे ताकि आपात स्थिति में लोगों की जान बचाई जा सके।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ आवेदन
गृहमंत्री के नाम लिखा गया यह आवेदन अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। लोग इसे सिस्टम की नाकामी और ग्रामीणों की मजबूरी का प्रतीक बता रहे हैं। कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर विकास के इतने बड़े दावों के बीच आज भी प्रदेश के कुछ गांव सड़क जैसी मूलभूत सुविधा से क्यों वंचित हैं।
यह मामला अब प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का विषय बन चुका है। लोगों की नजरें अब जिला प्रशासन और सरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं।
बड़ा सवाल – क्या अब जागेगा सिस्टम?
मरुकी गांव के ग्रामीणों की यह मांग भले ही “हेलीकॉप्टर” जैसी असामान्य लगे, लेकिन इसके पीछे छिपा दर्द बेहद वास्तविक है। यह केवल एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि उन तमाम दूरस्थ इलाकों की तस्वीर है जहां आज भी सड़क, स्वास्थ्य और परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाएं सपना बनी हुई हैं।
अब देखना यह होगा कि हेलीकॉप्टर की इस अनोखी मांग के बाद प्रशासन की नींद टूटती है या फिर ग्रामीण आने वाले दिनों में भी धूल, गड्ढों और अधूरी सड़क पर संघर्ष करते रहने को मजबूर रहेंगे।


