पहली बारिश में 19 लाख की ‘मजबूत’ दीवार धराशायी, ग्रामीण बोले-भ्रष्टाचार की नींव कितनी गहरी थी, अब जांच बताएगी !
घोटिया में रिटर्निंग वॉल ने खोली निर्माण की पोल! ग्रामीणों का दावा एस्टीमेट में 4 फीट तो मौके पर महज 2 फीट नींव! सवालों के घेरे में पंचायत प्रतिनिधि, जिम्मेदार अधिकारी और कथित ठेकेदार !
Chhattisgarh। सरकारी निर्माण कार्यों की मजबूती के दावों की असली परीक्षा जब प्रकृति लेती है, तो कभी-कभी जवाब कागजों में नहीं, बल्कि टूटे हुए निर्माण के मलबे में मिलता है। बालोद जिले के डौंडी ब्लॉक अंतर्गत ग्राम पंचायत घोटिया में भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला है, जहां करीब 19 लाख रुपये की लागत से बनी नवनिर्मित रिटर्निंग वॉल पहली बारिश में ही पानी के हल्के बहाव के सामने घुटने टेकता नजर आया।
अब सवाल यह नहीं कि दीवार क्यों टूटी? सवाल यह है कि 19 लाख रुपये की मजबूती आखिर कितने दिन की थी?
ग्रामीणों का आरोप है कि जिस रिटर्निंग वॉल का उद्देश्य मैदान की मिट्टी को नदी-नाले के कटाव से बचाना था, वही पहली बारिश में खुद कटाव और कथित अनियमितताओं की कहानी सुनाने लगा। ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण में उसी नदी की कथित गुणवत्ताहीन रेत का इस्तेमाल किया गया, जो निर्माण कार्य के लिए उपयुक्त नहीं थी।
यानी जिस पानी से मिट्टी बचानी थी, उसी पानी ने निर्माण की गुणवत्ता का ‘रियलिटी टेस्ट’ ले लिया!
एस्टीमेट में चार फीट, जमीन पर दो फीट?
मामले का सबसे गंभीर आरोप नींव की गहराई को लेकर सामने आया है। ग्रामीणों का दावा है कि एस्टीमेट के अनुसार रिटर्निंग वॉल की नींव करीब चार फीट गहरी होनी थी, लेकिन मौके पर कथित तौर पर महज दो फीट की नींव देकर निर्माण कर दिया गया।
अब अगर यह आरोप जांच में सही साबित होता है तो सवाल उठना लाजिमी है कि..
एस्टीमेट चार फीट का था तो जमीन पर दो फीट का ‘सरकारी संस्करण’ किसके आदेश पर तैयार हुआ?
क्या बाकी दो फीट नींव कागजों में ही खोद दी गई?
या फिर सरकारी निर्माण में अब नई तकनीक आ गई है…
‘कम नींव, ज्यादा भुगतान और बारिश में सीधा परिणाम!’
हालांकि इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
पंचायत निर्माण एजेंसी, काम ठेकेदार के माध्यम से-जिम्मेदारी किसकी?
ग्रामीणों के मुताबिक इस निर्माण कार्य में ग्राम पंचायत को निर्माण एजेंसी बनाया गया था और काम कथित ठेकेदार के माध्यम से कराया गया। ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण के दौरान गुणवत्ता के मानकों से कथित तौर पर समझौता किया गया और काम में मनमानी बरती गई।
यहीं से जिम्मेदारी का असली खेल शुरू होता है।
अगर पंचायत निर्माण एजेंसी है तो निगरानी किसकी थी?
अगर ठेकेदार ने निर्माण किया तो उसकी गुणवत्ता जांचने की जिम्मेदारी किसकी थी?
अगर तकनीकी मापदंडों के अनुसार काम हुआ तो पहली बारिश में दीवार क्यों बैठ गई?
और अगर सब कुछ एस्टीमेट के अनुसार हुआ, जैसा कि शोसल मिडिया रिपोर्ट के अनुसार तकनीकी सहायक देवेंद्र कुमार भूआर्य ने बताया है, तो फिर 19 लाख की दीवार का यह ‘बारिश स्पेशल प्रदर्शन’ आखिर किस तकनीकी सिद्धांत का हिस्सा है?
इन सवालों का जवाब ग्रामीणों को चाहिए।
जिसके लिए दीवार बनी, उसी का भरोसा टूट गया
घोटिया के खेखड़ी नाला क्षेत्र में यह तटबंध इसलिए बनाया गया था ताकि मैदान की मिट्टी का कटाव रोका जा सके। ग्रामीणों का सपना था कि लाखों रुपये खर्च कर बनाया गया यह निर्माण वर्षों तक मैदान और आसपास के क्षेत्र की रक्षा करेगा।
लेकिन पहली बारिश ने ही तस्वीर बदल दी।
दीवार टूटी और उसके साथ ग्रामीणों का भरोसा भी दरक गया।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर निर्माण में गुणवत्ताहीन सामग्री का इस्तेमाल हुआ और नींव भी निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं थी, तो यह सिर्फ सरकारी राशि के दुरुपयोग का सवाल नहीं बल्कि सार्वजनिक धन और ग्रामीणों के भरोसे के साथ खिलवाड़ का मामला भी हो सकता है।
‘भ्रष्टाचार’ शब्द आते ही राजनीति भी मैदान में
रिटर्निंग वॉल टूटने के बाद मामला केवल तकनीकी खराबी तक सीमित नहीं रहा। अब इसमें राजनीति का रंग भी चढ़ता दिखाई दे रहा है।

भाजपा मंडल अध्यक्ष कुसुमकसा योगेंद्र गांधी मौके पर पहुंचे और टूटे हुए रिटर्निंग वॉल के सामने से वीडियो जारी कर निर्माण में कथित भ्रष्टाचार का आरोप लगाया।
यानी अब टूटे हुए वॉल के सामने सिर्फ पानी नहीं बह रहा, बल्कि आरोप-प्रत्यारोप की राजनीतिक धारा भी तेज हो गई है।
ग्रामीणों की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि निर्माण में अनियमितता या भ्रष्टाचार प्रमाणित होता है तो संबंधित जनप्रतिनिधियों, जिम्मेदार अधिकारियों और कथित ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई की जाए। साथ ही ग्रामीणों ने राशि के भुगतान पर तत्काल रोक लगाने की मांग भी की है।
अधिकारी बोले-जांच होगी, फिर तय होगी जिम्मेदारी

मामले ने तूल पकड़ा तो प्रशासन ने भी जांच की बात कही है। अपर कलेक्टर चंद्रकांत कौशिक ने कहा कि पहली बारिश में रिटर्निंग वॉल टूटने के मामले में जांच प्रतिवेदन लेने के बाद टीम गठित की जाएगी और टीम की अनुशंसा के आधार पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
अब ग्रामीणों की निगाहें इसी जांच पर टिकी हैं।
क्योंकि असली सवाल यही है कि..
क्या टूटे हुए वॉल की जांच सिर्फ टूटे पत्थरों और बह गई मिट्टी तक सीमित रहेगी, या फिर उस पूरी व्यवस्था की भी जांच होगी जिसके तहत 19 लाख रुपये का निर्माण पहली बारिश में ही सवालों के कटघरे में खड़ा हो गया?
‘दीवार’ टूटी है या सिस्टम की मजबूती का दावा?
सरकारी निर्माण में अक्सर फाइलों में सब कुछ मजबूत दिखाई देता है…
एस्टीमेट मजबूत, माप मजबूत, भुगतान मजबूत और प्रमाणपत्र भी मजबूत।
लेकिन जब बारिश आती है तो पता चलता है कि जमीन पर मजबूती कितनी थी।
घोटिया का यह मामला भी अब यही सवाल पूछ रहा है कि अगर निर्माण वास्तव में एस्टीमेट और तकनीकी मानकों के मुताबिक हुआ था तो रिटर्निंग वॉल पहली बारिश में ही क्यों टूट गया?
और अगर कहीं नियमों की अनदेखी हुई है तो किसने देखी, किसने नहीं देखी और किसकी जिम्मेदारी थी?
फिलहाल दीवार टूट चुकी है, सवाल खड़े हो चुके हैं और ग्रामीण जवाब मांग रहे हैं।
अब देखना यह है कि जांच की ‘नींव’ कितनी गहरी होती है…
चार फीट या सिर्फ कागजों में दो फीट?
क्योंकि इस बार बारिश ने सिर्फ रिटर्निंग वॉल नहीं तोड़ा है, उसने सरकारी निर्माण की गुणवत्ता, निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

