जशपुर। छत्तीसगढ़ को यूं ही ‘धान का कटोरा’ नहीं कहा जाता। यहां की पहचान खेत, किसान और धान की बालियों से है। यही वजह है कि जब प्रदेश का मुख्यमंत्री खुद मुख्यमंत्री कार्यालय से निकलकर अपने गांव के खेत में बैलों के साथ हल पकड़ता है, तो यह केवल खेती नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी बन जाता है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अपने गृह ग्राम बगिया में खेत में उतरकर परंपरागत तरीके से बियासी की। बैलों के साथ हल चलाते हुए उन्होंने खेत की दोबारा जुताई की, ताकि जहां धान की रोपाई पूरी तरह नहीं हो पाई है, वहां नई पौध रोपी जा सके। ग्रामीण कृषि परंपरा में इस प्रक्रिया को ‘बियासी’ कहा जाता है।
सियासत से पहले किसान की पहचान

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि वे किसान परिवार से आते हैं और खेती उनके लिए केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन का संस्कार है। उन्होंने कहा कि खेत और किसान से उनका रिश्ता बचपन से जुड़ा है और जब भी अवसर मिलता है, वे खेती-किसानी के कामों में हाथ बंटाते हैं।
कृषि के जरिए राजनीतिक संदेश
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री का खेत में उतरना केवल निजी लगाव नहीं, बल्कि प्रदेश के करोड़ों किसानों के साथ जुड़ाव का भी संदेश है। छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि पर आधारित है और धान यहां की सबसे प्रमुख फसल है। ऐसे में मुख्यमंत्री का खुद हल चलाना किसानों के सम्मान और कृषि संस्कृति को प्राथमिकता देने का प्रतीक माना जा रहा है।
धान का कटोरा और खेती की परंपरा
देशभर में छत्तीसगढ़ को ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है। यहां लाखों किसान धान की खेती से जुड़े हैं और कृषि प्रदेश की आर्थिक रीढ़ मानी जाती है। बियासी जैसी पारंपरिक कृषि पद्धतियां आज भी ग्रामीण इलाकों में अपनाई जाती हैं, जो अच्छी पैदावार सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की खेत में हल चलाते और बियासी करते तस्वीरें अब केवल एक कृषि गतिविधि नहीं, बल्कि “मुख्यमंत्री पहले किसान, फिर राजनेता” का संदेश देती नजर आ रही हैं। धान के खेत से निकली यह तस्वीर प्रदेश की राजनीति में भी किसानों को केंद्र में रखने का संकेत मानी जा रही है।

