अफसर सोते रहे, ग्रामीण जाग गए… चंदा जुटाकर खुद बदल डाली स्कूल की छत
छत्तीसगढ़, बालोद। कहते हैं कि सरकारी स्कूलों में बच्चों का भविष्य बनाया जाता है, लेकिन बालोद जिले के ग्राम पंचायत काड़े में तो पहले बच्चों के सिर पर सुरक्षित छत होना भी नसीब नहीं था। जिस छत का काम मासूमों को बारिश से बचाना था, वही हर बारिश में आफत बनकर बरसने लगी। फर्क बस इतना था कि पानी छत से टपक रहा था और जिम्मेदारों की संवेदनाएं फाइलों में।
ग्रामीणों के मुताबिक प्राथमिक स्कूल भवन की छत लंबे समय से जर्जर हो चुकी थी। बारिश शुरू होते ही कक्षाओं में पानी टपकने लगता था। बच्चे किताबों से ज्यादा बाल्टियां और बेंच इधर-उधर सरकाने में व्यस्त रहते थे। ऊपर से हर वक्त यह डर भी बना रहता था कि कहीं छत का कोई हिस्सा गिर न जाए।
गांव वालों का कहना है कि उन्होंने कई बार शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के सामने स्कूल की बदहाल स्थिति रखी। आवेदन दिए, गुहार लगाई और उम्मीद की कि शायद किसी अधिकारी की नजर इस जर्जर छत पर पड़ जाएगी। लेकिन लगता है कि जिम्मेदारों की नजर सिर्फ फाइलों तक सीमित रह गई और स्कूल की छत उनकी प्राथमिकताओं की सूची में कभी पहुंच ही नहीं पाई।
आखिरकार ग्रामीणों ने तय किया कि अगर सिस्टम नहीं जागेगा तो गांव खुद जागेगा। गांव में चंदा इकट्ठा किया गया और लोगों ने अपने स्तर पर जर्जर छत को हटाकर सीमेंट शीट की नई छत लगवा दी। यानी जो काम सरकारी बजट से होना चाहिए था, वह गांव वालों की जेब से पूरा हुआ।

ग्राम पंचायत काड़े की सरपंच चन्द्रलेखा पायला ने कहा कि स्कूल भवन की जर्जर छत को लेकर कई बार संबंधित विभाग और अधिकारियों को अवगत कराया गया था। बच्चों की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता थी, लेकिन जब कोई पहल नहीं हुई तो ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से चंदा जुटाकर स्कूल की छत बदलने का निर्णय लिया।

ग्रामीण रोमन साहू ने बताया कि बारिश के दौरान स्कूल की छत से लगातार पानी टपकता था। बच्चे डर के साए में पढ़ाई करने को मजबूर थे। शासन-प्रशासन से कई बार मांग की गई, लेकिन जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो गांव के लोगों ने स्वयं आर्थिक सहयोग कर नई सीमेंट शीट की छत लगवाई।

शाला विकास समिति अध्यक्ष सीताराम चुरेन्द्र ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा किसी भी व्यवस्था की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि समय रहते जिम्मेदार विभाग कार्रवाई कर देता तो ग्रामीणों को अपनी जेब से पैसे खर्च कर स्कूल की छत नहीं बदलनी पड़ती। उन्होंने स्कूल भवन के शेष हिस्सों की भी जांच कर आवश्यक मरम्मत कराने की मांग की है।
यह सिर्फ एक स्कूल की छत बदलने की कहानी नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था के उस ढांचे पर करारा तमाचा है, जहां बच्चों की सुरक्षा भी ग्रामीणों के चंदे की मोहताज हो जाए। सवाल यह भी है कि जब ग्रामीण अपने सीमित संसाधनों से स्कूल की छत बदल सकते हैं, तो करोड़ों के बजट वाले विभाग आखिर किस काम में व्यस्त हैं?
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ फीता काटने और योजनाओं के पोस्टर लगाने तक सीमित रहेंगे, या कभी उन स्कूलों तक भी पहुंचेंगे जहां बच्चे हर बारिश में अपनी जान जोखिम में डालकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं?
बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर शासन की है या फिर हर गांव को अब अपने सरकारी स्कूलों के लिए भी चंदा पेटी खोलनी पड़ेगी? यह सवाल सिर्फ ग्राम काड़े का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के सामने खड़ा है।
हालांकि इस स्कूल में अतिरिक्त कक्ष (रूम) निर्माण की स्वीकृति मिल चुकी है और उसका निर्माण कार्य जारी है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि वर्षों से जर्जर हो चुकी स्कूल भवन की छत की मरम्मत की ओर जिम्मेदार विभाग का ध्यान नहीं गया। नए कमरे का निर्माण तो शुरू हो गया, मगर जिस छत के नीचे रोज मासूम बच्चे पढ़ने बैठते थे, उसकी सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह भगवान भरोसे छोड़ दी गई।

