बालोद जिले से सरकारी सिस्टम की बड़ी लापरवाही का ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सुशासन और डिजिटल व्यवस्था के तमाम दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां एक किसान पिछले करीब 5 महीनों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते हुए सिर्फ एक ही गुहार लगा रहा है- “मुझे जिंदा कर दीजिए साहब…”
हैरानी की बात यह है कि किसान पूरी तरह स्वस्थ और जीवित है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उसे मृत घोषित कर दिया गया है। इसी वजह से उसकी जिंदगी पूरी तरह प्रभावित हो चुकी है। ना बैंक से पैसा निकाल पा रहा है और ना ही खेती-किसानी के लिए उन्हें खाद और बिज मिल रहें हैं।
पूरा मामला बालोद जिले के ग्राम पंचायत कुसुमकसा के धुर्वाटोला का है, जहां 65 वर्षीय किसान जगन्नाथ शिवना सरकारी सिस्टम की एक बड़ी गलती का खामियाजा भुगत रहे हैं। किसान के मुताबिक दिसंबर महीने में वे हर महीने की तरह सरकारी राशन लेने उचित मूल्य की दुकान पहुंचे थे। दुकान में जब अंगूठा मशीन पर लगाया गया तो फिंगरप्रिंट मैच नहीं हुआ। कई बार कोशिश के बाद भी राशन नहीं मिला।
इसके बाद किसान चॉइस सेंटर और आधार सेंटर पहुंचे, जहां उन्हें जो जानकारी मिली उसने पूरे परिवार को परेशान कर दिया। किसान को बताया गया कि आधार रिकॉर्ड में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया है। यानी सरकारी दस्तावेजों में जगन्नाथ शिवना अब इस दुनिया में नहीं हैं।
यह सुनकर किसान और उसका परिवार स्तब्ध रह गया। सेंटर संचालकों ने बताया कि रिकॉर्ड सुधारने के लिए सभी दस्तावेज हैदराबाद भेजने होंगे। किसान ने आधार कार्ड सहित सभी जरूरी दस्तावेज पोस्ट के माध्यम से भेज दिए, लेकिन करीब 4 से 5 महीने बीत जाने के बाद भी रिकॉर्ड में कोई सुधार नहीं हुआ।
सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित होने का असर अब किसान की रोजमर्रा की जिंदगी पर साफ दिखाई दे रहा है। किसान बैंक से अपने खाते का पैसा नहीं निकाल पा रहा है। वहीं खरीफ सीजन शुरू होने से पहले खाद और बीज लेने में भी परेशानी आ रही है। खेती-किसानी पर संकट मंडराने लगा है।
सबसे बड़ी बात यह है कि किसान ने कई बार सरकारी दफ्तरों में आवेदन दिया। यहां तक कि सुशासन तिहार में भी अपनी समस्या रखी, लेकिन अब तक समाधान नहीं हो पाया। हर जगह सिर्फ आश्वासन मिल रहा है।
एक तरफ सरकार डिजिटल इंडिया और ऑनलाइन व्यवस्था को मजबूत करने की बात करती है, दूसरी तरफ एक जिंदा इंसान को खुद के जिंदा होने का प्रमाण लेकर भटकना पड़ रहा है। यह मामला सिर्फ एक किसान की परेशानी नहीं, बल्कि सरकारी सिस्टम की गंभीर खामियों और लापरवाही की तस्वीर भी दिखाता है।
अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक जिंदा इंसान को सरकारी रिकॉर्ड में जिंदा साबित करने में इतना लंबा समय क्यों लग रहा है…? और जब गलती सामने आ चुकी है, तब भी जिम्मेदार अधिकारी इसे सुधारने में क्यों नाकाम हैं…?
फिलहाल किसान जगन्नाथ शिवना आज भी यही उम्मीद लगाए बैठा है कि शायद किसी दिन सिस्टम उसे फिर से “जिंदा” मान ले।


